Sharing Light Of Truth , Smile And Tears Of History , lets being a Spritual

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Title : सब पापों की जड़ है मदिरा ।
Description :

 विकारों का मूल 



एक वाटिका के चार द्वार थे । एक पर दूध देेनेवाली गाय बैठी थी । वाटिका के मालिक की आज्ञा थी कि जो इसके चार लात मारे , वही भीतर आये । दूसरे द्वार पर कबाब रक्खे हुए थे । उनके लिए आज्ञा थी कि जो मनुष्य कबाब खाये , वही भीतर जाए । तीसरे द्वार पर एक वेश्या उपस्थित थी । इस द्वार की आज्ञा थी कि जो मनुष्य इससे  प्रेम करे वही भीतर जाए । चौथे द्वार पर मदिरा रखी थी । वहाँ प्रवेश के लिए आज्ञा थी कि जो इसको पिये , वहिउ भीतर जाये ।

एक बार एक वैष्णव ने उस वाटिका की प्रशंसा सुनकर जाने का विचार किया । जब वह पहले द्वार पर गया तो गाय और आज्ञा को देखकर कहा कि यह तो बड़ा भारी पाप है कि मैं अपने स्वाद के लिए गाय को , जिसको सारे संसार के लोग मानते हैं , लात मारूँ । यह सोचकर वह वहाँ से चलकर दूसरे द्वार पर गया । वहाँ कबाब देखकर कहा कि बड़े शोक की बात होगी , यदि मैं अपने पेट को पशुओं की समाधि बनाऊँ । क्योंकि जब कोई पशु मर जाता है तो हम उसे निकालकर घर से बाहर फेंक देते हैं और उसके सम्पर्क से भी घृणा करते हैं । मैं अपने स्वाद के कारण माँस जैसी अपवित्र वस्तु को जिसको लोग अपने घर में भी नहीं रखते , शरीर में कैसे रखूँ ? सब बातें सोचकर वह वहाँ से हट गया और तीसरे द्वार पर पहुँचा । वहाँ वेश्या को देखा तो सोचा कि यह तो समाज का नाश करनेवाली है ; मनुष्य की शत्रु है । इससे घृ्णा करना ही हितकर है । आगे चलकर वह चौथे द्वार पर गया तो वहाँ मदिरा को देखा । उसने सोचा कि 'एक तो इससे किसी की हत्या का डर नहीं है और इसके अतिरिक्त आगे कोई द्वार भी बाकी नहीं है । सब द्वार इसकी अपेक्षा अधिक निकृष्ट हैं , अतः अब इसी द्वार से चलना चाहिए । '

सारांश यह कि वैष्णव जी ने मदिरा पी ली । मदिरा पीते ही धर्म और अधर्म जा ज्ञान जाता रहा और वह महाशय वेश्या के पास पहुँचे । वेश्या ने कहा कि मदिरा के साथ कबाब न हो तो जीवन का आनन्द ही क्या ? फिर क्या था ! वैष्णव जी ने कबाब भी खाया । जब कबाब भी खा लिया तो हत्या का विचार बिलकुल ही जाता रहा  और गाय् के लात मारकर झट पहले द्वार से वाटिका के भीतर घुस गये ।


बच्चों ! संसार की सब बुराइयों की जड़ यह मदिरा है । इसे पीकर बुद्धि जाती रहती है  और बुद्धि के जाने से मनुष्य कुकर्मी होकर संसार की सारी बुराइयाँ करने लगता है । जो लोग मदिरा पीते हैं , वे लोग बुद्धि-नाश होने पर मूत्र तक पी जाते हैं , नालियों में लोटते हैं , कुत्ते उनके मुँह पर मूतते हैं ।


शिक्षा -- सब पापों की जड़ है मदिरा ।


~ स्वामी दर्शनानन्द 


**


( स्वामी दर्शनानन्द जी का यह कथा-संकलन ( कथा पच्चीसी ) उत्प्रेरक है , मर्म-स्पर्शी है । इसमें पौराणिक और लोक-कथाओं का रोचक वर्णन है । प्रत्येक कथा अंत में मार्मिक उपदेश दे जाती है । इसे सभी आयु के पाठक पढ़ें और ज्ञानार्जन करें , यही स्वामी दर्शनानन्द जी का ध्येय था और यही प्रकाशक ( विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द ) का उद्देश्य है । )


"मदिरा प्रेमियों" के द्वारा लाॅकडाउन की धज्जियाँ उड़ाते वीडियोज़ व् समाचारों के देख - सुनकर स्वामी जी की इस कथा की याद आ गयी । निःसन्देह मदिरा बुद्धि और विवेक को हर लेती है और मनुष्य अच्छा-बुरा , लाभ-हानि , धर्म-अधर्म सब भूल जाता है । 


Post by-- सुनीत कुमार

Post Date : 06/18/2021
Title : 🌷ओ३म् का जाप सर्वश्रेष्ठ🌷
Description :

ओ३म् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव ।यद्भद्रं तन्न आ सुव ।।


(यजुर्वेद -30-3 )

अर्थ = हे सकल जगत् के उत्पत्तिकर्त्ता,समग्र ऐश्वर्ययुक्त, शुद्ध स्वरूप, सब सुखों के दाता परमेश्वर! आप कृपा करके हमारे सम्पूर्ण दुर्गुण,दुर्व्यसन और दुःखों को दूर कर दीजिये ।जो कल्याणकारक गुण -कर्म -स्वभाव और पदार्थ हैं,वह सब हमको प्राप्त कराइये ।।


सरल-भावार्थ =


तू सर्वेश सकल सुखदाता ,शुद्ध स्वरूप विधाता है ।

उसके कष्ट नष्ट हो जाते, तेरी शरण जो आता है ।।

सारे दुर्गुण दुर्व्यसनों से, हमको नाथ बचा लीजे ।

मंगलमय! गुण -कर्म -पदारथ,प्रेम-सिन्धु हमको दीजे ।।


🌷ओ३म् का जाप सर्वश्रेष्ठ🌷


ओ३म् का जाप स्मरण शक्ति को तीव्र करता है,इसलिए वेदाध्ययन में मन्त्रों के आदि तथा अन्त में ओ३म् शब्द का प्रयोग किया जाता है।

मनुस्मृति में आया है कि ब्रह्मचारी को मन्त्रों के आदि तथा अन्त में ओ३म् शब्द का उच्चारण करना चाहिए।


क्योंकि आदि में ओ३म् शब्द का उच्चारण न करने से अध्ययन धीरे धीरे नष्ट हो जाता है तथा अन्त में ओ३म् शब्द न कहने से वह स्थिर नहीं रहता है। २/७४ ।।


कठोपनिषद में नचिकेता की कथा आती है।नचिकेता ने यम ऋषि से पूछा- हे ऋषि,मुझे यह बताइये कि संसार में सार वस्तु क्या है?

इस पर ऋषि ने उत्तर दिया,सब वेद जिस नाम के संबंध में वर्णन करते हैं,सभी तपस्वी जिसके विषय में कहते हैं,जिसकी प्राप्ति की इच्छा करते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं,उस नाम के संबंध में मैं तुझे संक्षेप में बताता हूं-वह ओ३म् नाम(शब्द) ही परमात्मा का श्रेष्ठतम नाम है।

यजुर्वेद में आया है कि मृत्यु को जीतने और मोक्ष को प्राप्त करने के लिए ओ३म् के अतिरिक्त और कोई भी मार्ग नहीं है। यमाचार्य ने तो नचिकेता को ओ३म् का महत्व बताते हुए यहां तक कह दिया है कि यह ओ३म् अक्षर निश्चय ब्रह्म है।यह ही अक्षर ब्रह्म के सब नामों में श्रेष्ठतम है।

इस अक्षर को जान लेने के बाद जापक जो इच्छा करता है उसकी वह इच्छा निश्चयपूर्ण हो जाती है।। कठोपनिषद २/१६ ।।


ऋग्वेद ने इसे स्पष्ट करते हुए कहा है-हे वीर प्रभो,आपकी मित्रता कठिनाई से नष्ट होने वाली है।अर्थात आपकी मित्रता स्थाई तथा विश्वसनीय है।

आप गाय चाहने वाले के लिए गाय हैं(देने वाले हैं) तथा घोडा चाहने वाले के लिए घोडा है ।।६/४५/२६ ।।


इस प्रकार ओ३म् के जापक को सभी उचित वस्तुएँ सुलभ हो जाती हैं।

प्रश्नोपनिषद् में तो पिप्पलाद ऋषि ने यहां तक कह दिया है कि जो निरन्तर इस तीन मात्राओं वाले ओ३म् अक्षर के द्वारा परब्रह्म का ध्यान करता है वह तेज में सूर्य के समान सम्पन्न हो जाता है ।।५/५ ।।


छान्दोग्य उपनिषद् के अनुसार देवता भी इस अविनाशी ,अमर तथा अभय ओ३म् अक्षर का सहारा लेकर अमर तथा अभय हो गये ।।२/४/४ ।।


गीता में श्रीकृष्ण इस ओ३म् अक्षर का महत्व बताते हुए अर्जुन से कहते हैं- इस एकाक्षर ब्रह्म स्वरुप ओ३म् का स्मरण करता हुआ जो मनुष्य इस शरीर का परित्याग करता है वह परमगति(मोक्ष) को प्राप्त होता है ।।८/१३ ।।


मुण्डकोपनिषद् ओ३म् की महिमा के वर्णन में कहता है-ओ३म् का जाप करने से ह्रदयग्रन्थि (सूक्ष्म शरीर) टूट जाती है।सब प्रकार के संशय नष्ट हो जाते हैं।उसके सब कर्म क्षीण हो जाते हैं।उस इन्द्रियातीत ओ३म् के दर्शन करने मात्र से ही ।। २/२८ ।।


कठोपनिषद में आगे कहा है-ओ३म् अनित्यों में एक नित्य है।अनेकों में वही एक है।श्रेष्ठ कामनाओं का वही एक पूरक है।जो धीर पुरुष इस ओ३म् को अपनी आत्मा में देखते हैं केवल उन्हें ही परम शान्ति प्राप्त होती है,अन्यों को नहीं ।।५/१३ ।।


आत्मा में विराजमान इस परमात्मा को धीर पुरुष परा विद्या से साक्षात्कार किया करते हैं;क्योंकि यह ओ३म् इन्द्रियातीत है।

वह नित्य,विभु,सर्वव्यापक,सूक्ष्म,अव्यय तथा सब प्राणियों का कारण है।

वह गोत्र,वंश,आंख,कान,हाथ,पांव से रहित है।

वह संसार की बीज शक्ति है।वह अशरीर है।वह नाडी आदि बन्धनों से जकडा नहीं है।वह मलरहित है।

पाप उसको बांध नहीं सकते।कोई स्थान उससे रिक्त नहीं।

उसका कोई उत्पादक नहीं है।

वह सवयं अपना स्वामी है।उसने अपनी सनातन प्रजाओं के लिए पदार्थों का ठीक ठीक रीति से विधान बनाया है। यजु: ४०/८ ।



Post Date : 06/07/2021
Title : Historical facts about India
Description :

 Historical facts about India

  • India never invaded any country in her last 10000 years of history.

  • India invented the Number System. Zero was invented by Aryabhatta.

  • The World's first university was established in Takshila in 700BC. More than 10,500 students from all over the world studied more than 60 subjects. The University of Nalanda built in the 4th century BC was one of the greatest achievements of ancient India in the field of education.

  • Sanskrit is the mother of all the European languages. Sanskrit is the most suitable language for computer software, reported in Forbes magazine, July 1987.

  • Ayurveda is the earliest school of medicine known to humans. Charaka, the father of medicine consolidated Ayurveda 2500 years ago. Today Ayurveda is fast regaining its rightful place in our civilization.

  • Although modern images of India often show poverty and lack of development, India was the richest country on earth until the time of British invasion in the early 17th Century.

  • The art of Navigation was born in the river Sindh 6000 years ago. The very word Navigation is derived from the Sanskrit word NAVGATIH. The word navy is also derived from Sanskrit 'Nou'.

  • Bhaskaracharya calculated the time taken by the earth to orbit the sun hundreds of years before the astronomer Smart.; Time taken by earth to orbit the sun: (5th century)365.258756484 days.

  • The value of pi was first calculated by Budhayana, and he explained the concept of what is known as the Pythagorean Theorem. He discovered this in the 6th century long before the European mathematicians.

  • Algebra, trigonometry and calculus came from India; Quadratic equations were by Sridharacharya in the 11th Century;The largest numbers the Greeks and the Romans used were 10^6(10 to the power of 6) whereas Hindus used numbers as big as 10^53(10 to the power of 53) with specific names as early as 5000 BCE during the Vedic period. Even today, the largest used number is Tera 10^12(10 to the power of 12).

  • According to the Gemological Institute of America, up until 1896, India was the only source for diamonds to the world.

  • USA based IEEE has proved what has been a century-old suspicion in the world scientific community that the pioneer of Wireless communication was Prof. Jagdeesh Bose and not Marconi.

  • The earliest reservoir and dam for irrigation was built in Saurashtra.

  • According to Saka King Rudradaman I of 150 CE a beautiful lake called 'Sudarshana' was constructed on the hills of Raivataka during Chandragupta Maurya's time.

  • Chess (Shataranja or AshtaPada) was invented in India.

  • Sushruta is the father of surgery. 2600 years ago he and health scientists of his time conducted complicated surgeries like cesareans, cataract, artificial limbs, fractures, urinary stones and even plastic surgery and brain surgery. Usage of anesthesia was well known in ancient India. Over 125 surgical equipment were used. Deep knowledge of anatomy, physiology, etiology, embryology,digestion, metabolism, genetics and immunity is also found in many texts.

  • When many cultures were only nomadic forest dwellers over 5000 years ago, Indians established Harappan culture in Sindhu Valley (Indus Valley Civilization)

  • The place value system, the decimal system was developed in India in 100 BC.
Post Date : 06/04/2021
Title : The Great Warrior Prithvi Raj Chauhan
Description :

 

“Night came: the beam of moon arose. The lord of men descended from his steed, and placed Sunjogta on another. The blood-stained arrows fly: one pierced the casque of the Chohan. Then did the bard demand to wield the sword; but his prince exclaimed, ‘Strong are our swords, of bard, leave thou the fight, that we may live in song.’




Extracted from the famous medieval epic poem Prithviraj Raso, translated by British officer and Oriental scholar James Tod, the stanza above refers to an episode in which the 12th century Chauhan dynasty ruler Prithviraj III kidnapped the princess of Kanauj, Sanyogita, from the middle of her swayamvar (wedding), as a mark of rebellion against her father King Jaichand, who frowned upon their love. While our hero and heroine advance on a steed, Prithviraj’s army, led by his political advisor and alleged author of this poem, Chand Bardai, fight back the Kanauj forces.

The 12th-century king, Prithviraj Chauhan (1166 CE to 1192 CE), is among the most well-known of Indian rulers. Stories of his daring exploits, romance with Princess Sanyogita and battle against Muhammad Ghori have inspired dramas, popular literature, television series and even movies.

But most of these stories are taken from the epic poem Prithviraj Raso, which cleverly combines fact and fiction to create a compelling narrative that endures even today. The poem follows the life of Prithviraj Chauhan, whose popularity stems mainly from his confrontation with invader Muhammad Ghori in the Second Battle of Tarain (1192). Chauhan’s defeat paved the way for the Ghurid forces to advance into the Ganga-Yamuna Doab and lay the foundation of Muslim rule in the Indian subcontinent, which lasted for several centuries.

The Raso is not the only account of Prithviraj Chauhan’s life. There are a few others, although not as well-known. According to historians, the most reliable is the Prithviraja Vijaya composed around 1191-1192 CE by Jayanaka, a Kashmiri poet-historian of Prithviraj Chauhan’s court. There are also accounts by Jain authors – Prabandha Chintamani (1304 CE) and Prithviraja Prabandha (1471 CE) – that are far more ‘critical’ accounts of his reign. But Raso is undoubtedly the most popular and well-known.

According to these accounts, Prithviraj ascended the throne in c. 1178 CE at the tender age of 11 after the death of his father, the Chahamana/Chauhan ruler, Someshvara. His mother, Karpuradevi, a Kalachuri princess, was his regent. His capital was located at Ajayameru (Ajmer) and it is believed that his empire covered much of present-day Rajasthan, Haryana, Delhi and some parts of Punjab, Madhya Pradesh and Uttar Pradesh. Historian Dashratha Sharma, who has extensively researched the history of Rajasthan and authored many books on the Chauhan dynasty, says that Prithviraj’s territory extended from Thanesar (in Haryana) in the north to Jahazpur (in Mewar) in the south.

The Chauhans were predominant although not the only power in Rajasthan.

During this period, Prithviraj’s chief minister was Kadambavasa, also called ‘Kaimasa’ by certain accounts, and he was responsible for many victories during the early years of the young king. The first military achievement of Prithviraj was his suppression of a revolt by his cousin Nagarjuna, son of Prithviraj’s uncle Vigraharaja IV. The struggle for the Chahamana throne had sparked a rivalry between the two branches of the family. Nagarjuna captured Gudapura (possibly Gurgaon), and Prithviraj immediately marched against him with a huge army and recaptured Gudapura.

Soon, many minor chiefs and independent rulers were brought under Chauhan rule and wars raged against the Chandelas of Jejakabhukti, Paramaras of Abu, Solankis of Gujarat and Gahadavalas of Kannauj, among others.

But Prithviraj’s biggest enemy was Muhammad Ghori. The conqueror had shifted his base from Ghazna in Central Afghanistan to Punjab and was expanding his empire eastwards. This brought him in conflict with Prithviraj and both the camps engaged in two major battles. The First Battle of Tarain was fought in 1191 when the Ghurid forces captured the Tabarhindah fort (probably present-day Bathinda). Prithviraj marched against them with infantry, cavalry and an elephant force, and successfully forced them to retreat. However, to avenge this defeat, Ghori came back with a well-equipped army in 1192 and attacked the not-so-prepared Prithviraj’s army.

Prithviraj Raso blames the 25-year-old Prithviraj for his inattentiveness. It says that the king had become so infatuated with his new wife Sanyogita that he spent most of his time with her, ignoring the state affairs and a further threat from Ghori. Other than this one critical reference, the poem eulogises the king and his heroic exploits, creating an aura, that ensured that Prithviraj remains a well-loved hero even today.

Written in Pingal, an eastern Rajasthani variant of Brajbhasha, the Raso presents court poet Chand Bardai as its writer.

He appears to have been an active participant in the momentous events of the 12th-century ruler. Because of this, British scholar James Tod, an East India Company officer and who wrote the magnum opus Annals And Antiquities of Rajas’than, considered Raso a valuable eyewitness account.

Since the 16th century, Rajput rulers had patronized the Raso for its elements of heroism, romance and revenge. The epic poem presented Prithviraj’s conflict with Ghori as an act of valour and patriotism, and this soon became a potent symbol of Rajput identity.

Amazingly, Mughal chronicler Abul Fazl too referred to Raso when writing his book Ain-i-Akbari, which pertained to Akbar’s empire. His work contains a section that covers the 15 provinces of Mughal India and for each of them there’s a short geographical introduction, historical background and statistical information on economic revenues and the human population. For the Delhi province, he uses the Raso as a reference.

But there are many glaring ‘loopholes’ in this epic poem, and it is only in modern times that they have been identified by scholars such as Kaviraj Shyamaldas, G H Ojha and Cynthia Talbot.

The Raso equates Prithviraj with Lord Ram and assigns him larger-than-life characteristics. The king is said to have had 32 accomplishments besides 72 graces of minor description. Raso also claims he was fluent in 14 languages!

Next, Prithviraj’s mother is said to be the daughter of the Delhi ruler, Anangpal Tomar. Since he did not have any sons, he gave the kingdom to Prithviraj, who made Delhi his primary base. Historians say neither is is backed by facts.

According to Frances Pritchett, a professor of South Asian Literature at Columbia University in the US, the kidnapping of Princess Sanyogita is only one of three key episodes integral to the plot of Raso. The other two are the killing of Chief Minister Kadambavasa and the murder of Ghori, both by Prithviraj.

According to Raso, Kadambavasa falls in love with a maid working in the queen’s palace and visits her regularly. When the king learns of this, he considers it a violation of the women’s quarters and shoots an arrow at Kadambavasa during one of his nocturnal visits. Both the lovers are secretly buried, but Bardai learns about the king’s dishonourable act in a dream.

For the part following the Second Battle of Tarain, Raso says that Prithviraj was taken to Ghazna in Afghanistan as a prisoner and blinded. When Bardai heard of this, he travelled all the way to Ghazna to save his king. Somehow, he talked Ghori into letting a blind Prithviraj put on an archery performance. Ghori agreed. Just before the ‘performance’, Bardai indicated where Ghori was seated to Prithviraj through the following lines:

Char bans, chaubis gaj, angul ashta praman, Ta upar sultan hai, Chuke mat Chauhan

(Four measures ahead of you and twenty four yards away as measured with eight finger measurement, is seated the Sultan. Do not miss him now, Chauhan)

According to the Raso Prithviraj shot an arrow in the direction of Ghori and killed him. Prithviraj and Bardai also died shortly after. In the Raso’s narrative, Prithviraj thus regains his honour, if not his kingdom.

Howeverall these episodes appear to be fictional, as suggested by other chronicles of the medieval king. The oldest and historically most reliable is the Prithviraja Vijaya composed by Jayanaka, a Kashmiri poet-historian in his court.

Meanwhile accounts by Jain author of Prithviraj Prabandha says that Kadambavasa was killed by the king as he had allied with the Ghurid forces. Also, historical records suggest that Ghori continued to rule for more than a decade after Prithviraj’s death.

The most suspicious claim is that if Bardai died along with his king in Ghazni, far away from the court, who knew of the events that had allegedly taken place there, and by adding them to the poem, gave it a perfect ending? Legend says that the concluding part of the poem was composed by Bardai’s son Jalna.

The final and biggest challenge with Raso is its date. Most modern scholars believe it was not composed during Prithviraj’s time and date it at least 300-400 years later, to the 16th century. But some believe that Bardai had composed a text which formed the basis for the current version of the epic poem.

Even since the 16th century, the size of the text has swelled greatly because of several interpolations and additions, resulting in multiple recensions or revised versions. The poem now exists in four major manuscript traditions – text and the description of events varying in each of them.

Only a small portion of the existing recensions is likely to have been part of the original version. The closest to the original is believed to be a small, 1,300 stanza manuscript discovered at Dharanojwali village in Gujarat and dated to 1610. Its language is more archaic than other versions and was copied for a grandson of Kalyanmal, the Rathore ruler of Bikaner.

The longest available version is the Udaipur (Mewar) manuscript, which is an epic comprising 16,306 stanzas!

The language of the texts available today appears to be the post-15th century. The most popular and the first printed version of the text is based on a 1703 CE manuscript commissioned by Amar Singh II in 1703, the Sisodiya ruler of Mewar.

The details are different in each version and the longer ones are the most questionable. For example, the shortest one mentions Sanyogita as Prithviraj’s only wife, while the Mewar version claims Prithviraj married 12 other princesses, many of them presented to him by his nobles.

But in spite of its obvious drawbacks, Raso is undeniably a valuable piece of literature. It throws great light on the political, military and socio-economic structure of the Rajasthan clans immediately before the establishment of Turkish rule in India. And it is a testimony to its lyrical brilliance that it is still read, enjoyed and treasured by so many millions!

Post Date : 04/28/2021
Title : ◆ *छत्रपति शिवाजी महाराज और स्त्री-सम्मान*
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 ◆ *छत्रपति शिवाजी महाराज और स्त्री-सम्मान*

मराठों के इतिहास में छत्रपति शिवाजी महाराज की उदारता, जन्मजात दयालुता, निष्पक्षता व महिलाओं के प्रति सम्मान के असंख्य किस्से अंकित है। 


शिवाजी महाराज के विजय-अभियान के दौरान महाराज के साथियों ने जब कल्याण शहर अपने कब्जे में लिया तब उस शहर का गवर्नर मुल्ला अहमद नामक एक अरब था। कल्याण उस समय बीजापुरी आदिलशाही सल्तनत में एक समृद्ध शहर था।


कल्याण विजय के दौरान मराठों के हाथ में मुल्ला अहमद का पूरा परिवार आ गया तब मराठों ने उस परिवार के सदस्यों में से मुस्लिम गवर्नर अहमद की पुत्रवधू को शिवाजी महाराज के पास भेज दिया। 


जब अप्रतिम सौंदर्य की धनी उस स्त्री को महाराज के समक्ष प्रस्तुत किया गया तब महाराज ने अपने आसन से खड़े होकर उस स्त्री को विनम्रता से नमन किया और उसके सौंदर्य की प्रसंशा करते हुए कहा, "काश, मेरी माता भी आप जैसी सुंदर होती तो मैं भी आज अधिक रूपवान होता!"


यह दृश्य देखकर वहाँ उपस्थित लोग हक्का-बक्का रह गए। एक बंदी बनाई गई दुश्मन पक्ष की स्त्री को सम्बोधित अपने इस सरल शब्दों के माध्यम से शिवाजी महाराज ने अपने साथीदारों से समक्ष महिलाओं का सम्मान करने का एक अनुकरणीय दृष्टांत प्रस्तुत किया।

Post By:-

(सन्दर्भ: Shivaji: The Portrait of a Patriot, लेखक: ए. आर. कुलकर्णी, पृ. 45-46, भावानुवाद: राजेश आर्य)

Post Date : 04/24/2021
Title : जानिए राम नवमी तथा रामायण का गूढ़ ज्ञान | Date, Time, History, Significance, Story, Importance and all you need to know 2021
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जानिए राम नवमी तथा रामायण का गूढ़ ज्ञान | Knowledge behind Ram Navami and Ramayana 2021, Date, Time, History, Significance, Story, Importance and all you need to know





भगवान राम का अर्थ क्या है ? | Meaning of Lord Rama

राम का अर्थ है, स्वयं का प्रकाश; स्वयं के भीतर ज्योति। "रवि" शब्द का अर्थ "राम" शब्द का पर्यायवाची है। रवि शब्द में ‘र’ का अर्थ है, प्रकाश और "वि" का अर्थ है, विशेष। इसका अर्थ है, हमारे भीतर का शाश्वत प्रकाश। हमारे ह्रदय का प्रकाश ही राम है। इस प्रकार हमारी आत्मा का प्रकाश ही राम है।

राम नवमी तथा राम जन्म का गूढ़ ज्ञान | Knowledge behind Ram navami and Lord Rama's Birth

राम नवमी, भगवान श्री राम के जन्मदिन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। हर्ष एवं उल्लास के इस पर्व के मनाए जाने का उद्देश्य है - हमारे भीतर "ज्ञान के प्रकाश का उदय"। भगवान राम का जन्म राजा दशरथ और रानी कौशल्या के यहाँ हुआ था।

कौशल्या का अर्थ है, कुशलता और दशरथ का मतलब है, जिसके पास दस रथ हो। हमारे शरीर में १० अंग हैं, पाच ज्ञानेन्द्रियाँ (पाच इन्द्रियों के लिए) और पांच कर्मेन्द्रिया (जो की दो हाथ, दो पैर, जननेन्द्रिय, उत्सर्जन अंग और मुह)।

सुमित्रा का अर्थ है, जो सब के साथ मैत्रीय भाव रखे और कैकयी का अर्थ है, जो बिना के स्वार्थ के सब को देती रहे।

इस प्रकार दशरथ और उनकी तीन पत्नियाँ एक ऋषि के पास गए। जब ऋषि ने उनको प्रसाद दिया तब ईश्वर की कृपा से, भगवान राम का जन्म हुआ।

भगवान राम स्वयं का प्रकाश हैं, लक्ष्मण (भगवन राम के छोटे भ्राता) का अर्थ है, सजगता, शत्रुघ्न का अर्थ हैं, जिसका कोई शत्रु ना हो या जिसका कोई विरोधी ना हो। भरत का अर्थ है योग्य।

अयोध्या (जहाँ राम का जन्म हुआ है) का अर्थ है, वह स्थान जिसे नष्ट ना किया जा सके।

रामायण का सार | Summary of Ramayana

इस कहानी का सार है: हमारा शरीर अयोध्या है, पांच इन्द्रियां और पांच कर्मेन्द्रियाँ इस के राजा हैं। कौशल्या, इस शरीर की रानी है। सभी इन्द्रियां ब्राह्य मुखी हैं और बहुत कुशलता से इन्हें भीतर लाया जा सकता है और ये तभी हो सकता हैं जब भगवन राम, प्रकाश हम में जन्म लें।

भगवान राम का जन्म नवमी के दिन हुआ था (हिन्दू पंचांग के अनुसार नौवां दिन)। मैं इनके महत्व के बारे में किसी और समय बताऊंगा।

जब मन (सीता) अहंकार (रावण) के द्वारा अपहृत हो जाता है, तो दिव्य प्रकाश और सजगता (लक्षमण) के माध्यम भगवन हनुमान (प्राण के प्रतीक) के कंधो पर चढ़कर उसे घर वापस लाया जा सकता है। ये रामायण हमारे शरीर में हर समय घटित होती रहती है।


Rama Navami 2021 Tithi
The Navami Tithi will start at 12:43 AM, April 21 and end at 12:35 AM, April 22.

Rama Navami 2021 Puja Shubh Muhurat

The Ram Navami puja should be performed during the Madhyana (afternoon). The Shubh Muhurat will be observed between 11:02 AM to 1:38 PM.

Post Date : 04/21/2021
Title : दुनिया को राह दिखाता फ्रांस...
Description :

 ◆ दुनिया को राह दिखाता फ्रांस...





(फ्रांसीसी संसद ने ‘गणतांत्रिक मूल्यों को सशक्त करने का विधेयक’ पारित किया है। इसका उद्देश्य आम मुसलमानों को रेडिकल यानी चरमपंथी इस्लाम से दूर रखना है। इसमें मस्जिदों को बाहरी धन लेने से रोकना मुस्लिम बच्चों को भूमिगत इस्लामी प्रशिक्षण स्थलों में भेजने से रोकने जैसे प्रविधान हैं।)


फ्रांसीसी संसद ने हाल में ‘गणतांत्रिक मूल्यों को सशक्त करने का विधेयक’ पारित किया है। इसका उद्देश्य आम मुसलमानों को रेडिकल यानी चरमपंथी इस्लाम से दूर रखना है। इसमें मस्जिदों को बाहरी धन लेने से रोकना, मुस्लिम बच्चों को भूमिगत इस्लामी प्रशिक्षण स्थलों में भेजने से रोकना, डॉक्टरों द्वारा मुस्लिम लड़कियों को ‘कुंआरी होने का प्रमाण’ देने पर रोक लगाने जैसे प्रविधान हैं। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने इसे ‘इस्लाम पर हमला’ करार दिया है। वहां फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों के पुतले जलाए गए। इस बीच अहम सवाल यही है कि क्या राज्य या सरकार जिहादियों और अन्य पक्षों के बीच तटस्थ बने रहें? यदि राज्य निर्विकार हो जाए तो संविधान को अंगूठा दिखाते हुए इस्लामवादी पूरे देश को शरीयत से चलने पर विवश करेंगे। यूरोप में कई स्थानों पर यह दिखने भी लगा है।


केवल मुस्लिम देश ही नहीं, लोकतांत्रिक देशों में भी मुस्लिम दबदबे वाले इलाकों में अन्य धर्मों के त्योहार मनाने से रोका जाता है। हर कहीं शरीयत थोपने की जिद राजनीति है, किंतु मैक्रों के अनुसार, ‘इस्लाम पर बहस में हम प्राय: किंतु-परंतु करने लगते हैं। हर आतंकी हमले के बाद यही होता है।’ फ्रांसीसी अवधारणा ‘लयसिटे’ यानी सेक्युलर नीति पर गलतफहमी भी उसका उदाहरण है। इसके तहत वहां किसी भी धर्म की आलोचना और खिल्ली उड़ाने तक का अधिकार है। फ्रांस में चर्च के वर्चस्व के प्रतिरोध में ही यह अवधारण उत्पन्न हुई थी। उसी के बाद वहां तर्क, विज्ञान और स्वतंत्रता का विकास हुआ। फ्रांसीसी पत्रिका शार्ली अब्दो ने मुहम्मद साहब के कार्टून छापने के दशकों पहले से ईसा मसीह के असंख्य कार्टून भी प्रकाशित किए।


वस्तुत: ऐसे मुसलमान भी हैं जो इस्लाम की आलोचना करना चाहते हैं, परंतु उन्हें भी भय से मौन रहना पड़ता है। आज 80 प्रतिशत फ्रांसीसी मानते हैं कि उन पर खतरा है। गत वर्ष एक शिक्षक सैम्युल पैटी की गला काटकर हुई हत्या उसी क्रम में है। किसी प्रतिवाद के लिए न्यायालय जाने के बजाय शरीयत के लिए हत्याएं करना राष्ट्रीय संस्कृति पर खुली चोट है, लेकिन इसे रोकने के उपायों को ‘मुसलमानों को दबाने’ की कोशिश कहा जा रहा है। इस चुनौती के समक्ष फ्रांस अपना सेक्युलरिज्म बचाने की कोशिश कर रहा है। रोचक यह कि फ्रांस में इस्लामी नेता सेक्युलरिज्म के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं, जबकि भारत में ऐसे ही नेता सेक्युलरिज्म की दुहाई देते हैं। कारण यही कि भारतीय नीतियां इस्लामपरस्त हैं। डॉ. आंबेडकर ने स्वयं कहा था कि भारतीय संविधान धार्मिक आधार पर नागरिकों के बीच भेदभाव करता है। इसीलिए यहां इस्लामी नेता सेक्युलरिज्म की रट लगाते हैं, जबकि फ्रांस में सेक्युलरिज्म को चुनौती देते हैं। वे जिहादी हमलों का दोष भी सेक्युलरिज्म को देते हैं। जिहादियों द्वारा शार्ली अब्दो के अधिकांश पत्रकारों को मार डालने का दोष उस पत्रिका पर ही मढ़ा गया। यहां भी मुंबई आतंकी हमले के बाद संसद में कहा गया कि यदि भारत इजरायल और अमेरिका के प्रति झुकाव रखेगा तो ऐसे हमले होंगे ही। अमेरिका में भी 11 सितंबर के हमले के बाद कइयों ने कहा कि यह तो होना ही था।


वस्तुत: लंबे समय से यूरोप में बहुलवाद की स्वीकृति के कारण तमाम इस्लामी रीतियों को छूट मिलती रही, लेकिन धीरे-धीरे हर कहीं महसूस किया गया कि इससे समाज में बहुलता के बजाय शरीयत का दबदबा क्रमश: बढ़ा। इस्लामी समूहों ने स्थानीय संस्कृति स्वीकारने के बदले हर बात में इस्लामी मान्यताएं लादने की नीति रखी। इसके लिए अविराम मांगें, शिकायतें और हिंसा उनका आम व्यवहार है। तुष्टीकरण ने संतुष्ट करने के बजाय उनकी उग्रता ही बढ़ाई है। इस चलन का एक कारण इस्लामी इतिहास और सिद्धांत के प्रति सार्वभौमिक अज्ञान भी है। जिनका मुकाबला करना है, उन्हीं से पूछ-पूछ कर चलने की नीति अधिकांश सरकारों ने अपना रखी है। वे ‘उदार’ मुसलमान नेताओं को ढूंढते हैं, पर प्राय: छल के शिकार होकर और जमीन दे बैठते हैं। फिर अपनी भूल छिपाने के चक्कर में नई-नई भूलें करते हैं। इस तरह, जिहाद इंच-इंच बढ़ता, जीतता है और काफिर तिल-तिल मरते, हारते हैं। भारत इसका क्लासिक उदाहरण है। दशकों पहले ही एक तिहाई देश इस्लाम को देकर भी उसे संतुष्ट करने के बजाय बाकी पूरा देश दांव पर लग गया है।


इसका कारण यही है कि लोकतांत्रिक देशों के नेता और बुद्धिजीवी आदि जिहाद के इतिहास से पूर्णत: अंधेरे में रहते हैं। अपनी इकहरी नैतिकता के चलते पूरी समस्या को समझ नहीं पाते। इसीलिए, धीरे-धीरे सभी लोकतांत्रिक देशों में इस्लामी दबदबा बढ़ा। फ्रांस ने अभी समझना ही शुरू किया है कि उनके देश में एक ‘विशेष वर्ग’ है, जो देश में मिल-जुल कर नहीं रहना चाहता। लिबरल बुद्धिजीवी भी फ्रांस में ‘मुसलमानों को निशाना बनाने’ की शिकायत करते हैं, जबकि विपरीत निशाने को नजरअंदाज करते हैं। आखिर जितने मुसलमान किसी यूरोपीय देश या अमेरिका में हैं, उतने ही प्रतिशत हिंदू या बौद्ध भी हैं, किंतु ये किसी देश में कभी समस्या नहीं बनते। हर कहीं राजनीतिक इस्लाम दूसरों को निशाना बनाता है, जिसे रोकने के उपाय करने की कोशिश को मुसलमानों को परेशान करना कहा जाता है। वस्तुस्थिति यह है कि हरेक गैर-मुस्लिम देश में अधिकांश मुस्लिम नेता अलगाववादी भावना से चलते हैं। वे पूरे देश पर नियंत्रण या उसे तोड़ने की कोशिश करते हैं। राष्ट्रीय कानूनों की अवहेलना कर शरीयत की मांग उसी का अंग है। यह धर्म नहीं, राजनीति है।


नि:संदेह मुसलमानों के विरुद्ध आम संदेह अनुचित है, किंतु इसे खत्म करने में मुसलमानों की भी जिम्मेदारी है। पहले उन्हें इस्लाम की घोषित काफिर-घृणा को सचमुच बंद करना होगा। ‘इस्लामोफोबिया’ की शिकायत झूठी है, क्योंकि खुद मुसलमान भी स्वतंत्रतापूर्वक उसके बारे में बोलने से डरते हैं। तमाम इस्लामी नेता धमकी की भाषा बोलते हैं। सेक्युलरिज्म एकतरफा नहीं चल सकता। फ्रांस में लयसिटे और इस्लाम की कशमकश इसी बात पर है। आज नहीं तो कल, इस्लाम की इस मूल टेक को खंडित करना ही होगा कि उसे पूरी दुनिया पर शासन का अधिकार है। इसके बाद ही समान सहजीवन का रास्ता खुलेगा।


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Post Date : 04/07/2021
Title : सर्वप्रथम हनुमान जी ने लिखी थी रामायण लेकिन फ़ेंक दी थी समुद्र में, जानिए क्यों?
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सर्वप्रथम हनुमान जी ने लिखी थी रामायण लेकिन फ़ेंक दी थी समुद्र में, जानिए क्यों?

Hanumad Ramayan Story in Hindi :  प्रभु श्री राम के जीवन पर अनेकों रामायण लिखी गई है जिनमे प्रमुख है वाल्मीकि रामायण, श्री राम चरित मानस, कबंद रामायण (कबंद एक राक्षस का नाम था), अद्भुत रामायण और आनंद रामायण। लेकिन क्या आप जानते है अपने आराध्य प्रभु श्री राम को समर्पित एक रामायण स्वयं हनुमान जी ने लिखी थी जो ‘हनुमद रामायणके नाम से जानी जाती है। इसे ही प्रथम रामायण होने का गौरव प्राप्त है। लेकिन स्वयं हनुमान जी ने ही अपनी उस रामायण को समुद्र में फ़ेंक दिया था।  लेकिन उन्होंने ऐसा क्यों किया आइये जानते है शास्त्रों में वर्णित एक गाथा-



शास्त्रों के अनुसार सर्वप्रथम रामकथा हनुमानजी ने लिखी थी और वह भी एक शिला (चट्टान) पर अपने नाखूनों से लिखी थी। यह रामकथा वाल्मीकिजी की रामायण से भी पहले लिखी गई थी और यहहनुमद रामायणके नाम से प्रसिद्ध है।

यह घटना तब की है जबकि भगवान श्रीराम रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद अयोध्या में राज करने लगते हैं और श्री हनुमानजी हिमालय पर चले जाते हैं। वहां वे अपनी शिव तपस्या के दौरान एक शिला पर प्रतिदिन अपने नाखून से रामायण की कथा लिखते थे। इस तरह उन्होंने प्रभु श्रीराम की महिमा का उल्लेख करते हुएहनुमद रामायणकी रचना की।

कुछ समय बाद महर्षि वाल्मीकि ने भीवाल्मीकि रामायणलिखी और लिखने के बाद उनके मन में इसे भगवान शंकर को दिखाकर उनको समर्पित करने की इच्छा हुई। वे अपनी रामायण लेकर शिव के धाम कैलाश पर्वत पहुंच गए। वहां उन्होंने हनुमानजी को और उनके द्वारा लिखी गईहनुमद रामायणको देखा। हनुमद रामायण के दर्शन कर वाल्मीकिजी निराश हो गए।

वाल्मीकिजी को निराश देखकर हनुमानजी ने उनसे उनकी निराशा का कारण पूछा तो महर्षि बोले कि उन्होंने बड़े ही कठिन परिश्रम के बाद रामायण लिखी थी लेकिन आपकी रामायण देखकर लगता है कि अब मेरी रामायण उपेक्षित हो जाएगी, क्योंकि आपने जो लिखा है उसके समक्ष मेरी रामायण तो कुछ भी नहीं है।


तब वाल्मीकिजी की चिंता का शमन करते हुए श्री हनुमानजी ने हनुमद रामायण पर्वत शिला को एक कंधे पर उठाया और दूसरे कंधे पर महर्षि वाल्मीकि को बिठाकर समुद्र के पास गए और स्वयं द्वारा की गई रचना को श्रीराम को समर्पित करते हुए समुद्र में समा दिया। तभी से हनुमान द्वारा रची गई हनुमद रामायण उपलब्ध नहीं है।

हनुमानजी द्वारा लिखी रामायण को हनुमानजी द्वारा समुद्र में फेंक दिए जाने के बाद महर्षि वाल्मीकि बोले कि हे रामभक्त श्री हनुमान, आप धन्य हैं! आप जैसा कोई दूसरा ज्ञानी और दयावान नहीं है। हे हनुमान, आपकी महिमा का गुणगान करने के लिए मुझे एक जन्म और लेना होगा और मैं वचन देता हूं कि कलयुग में मैं एक और रामायण लिखने के लिए जन्म लूंगा। तब मैं यह रामायण आम लोगों की भाषा में लिखूंगा।


माना जाता है कि रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास कोई और नहीं बल्कि महर्षि वाल्मीकि का ही दूसरा जन्म था। तुलसीदासजी अपनीरामचरित मानसलिखने के पूर्व हनुमान चालीसा लिखकर हनुमानजी का गुणगान करते हैं और हनुमानजी की प्रेरणा से ही वे फिर रामचरित मानस लिखते हैं।

माना जाता है महाकवि कालिदास के समय में एक पटलिका को समुद्र के किनारे पाया गया जिसे कि एक सार्वजनिक स्थल पर टांग दिया गया था ताकी विद्यार्थी उस गूढ़लिपि को पढ़कर उसका अर्थ निकाल सकें। ऐसा माना जाता है कि कालीदास ने उसका अर्थ निकाल लिया था और वो ये भी जान गये थे कि ये पटलिका कोई और नहीं अपितु हनुमानजी द्वारा रचित हनुमद रामायण का ही एक अंश है जो कि पर्वत शिला से निकल कर जल के साथ प्रवाहित होकर यहां तक गया है।

Post By Pankaj Rambhakt


Post Date : 03/23/2021
Title : शिवरात्रि का त्यौहार बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है
Description :

हिन्दू धर्म में शिवरात्रि का त्यौहार बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है इस दिन भगवान शिव के भक़्तजन उन्हें खुश रखने के लिए उपवास रखते है | यह दिन हर साल बसंत पंचमी के बाद तथा होली के त्यौहार से पहले पड़ता है साल 2021 में शिवरात्रि का त्यौहार 11 March को है | इस दिन सभी हिन्दू धर्म के लोग एक-दूसरे को इस दिन की बधाई या शुभकामनाये देते है I



 # करूँ क्यों फ़िक्र कि मौत के बाद जगह कहाँ मिलेगी, जहाँ होगी मेरे महादेव की महफ़िल मेरी रूह वहाँ मिलेगी. कैसे कह दूँ कि मेरी, हर दुआ बेअसर हो गई, मैं जब-जब रोया तब-तब महादेव को खबर हो गई. दिखावे की मोहब्बत से दूर रहता हूँ मैं इसलिए भोले के नशे मे चूर रहता हू मैं.


Bhole K Bhakto Ka Jaikara .

# भोले की भक्ति में मुझे डूब जाने दो शिव के चरणों में शीश झुकाने दो आई है शिवरात्रि मेरे भोले बाबा का दिन आज के दिन मुझे भोले के गीत गाने दो

# सारा जहाँ है जिसकी शरण में नमन है उस शिव जी के चरण में बने उस शिवजी के चरणों की धुल आओ मिल कर चढ़ाये हम श्रद्धा के फूल शिव की बनी रहे आप पर छाया पलट दे जो आपकी किस्मत की काया मिले आपको वो सब इस अपनी ज़िन्दगी में जो कभी किसी ने भी ना पाया महाशिवरात्रि च्या शुभेच्छा


Mahashivratri Katha


एक बार पार्वती ने भगवान शिवशंकर से पूछा, 'ऐसा कौन सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्यु लोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?'

उत्तर में शिवजी ने पार्वती को 'शिवरात्रि' के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई- 'एक गाँव में एक शिकारी रहता था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधवश साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।

शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। 

अपनी दिनचर्या की भाँति वह जंगल में शिकार के लिए निकला, लेकिन दिनभर बंदीगृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल-वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढँका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला।

पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियाँ तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए।
एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुँची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, 'मैं गर्भिणी हूँ। शीघ्र ही प्रसव करूँगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं अपने बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे सामने प्रस्तुत हो जाऊँगी, तब तुम मुझे मार लेना।' शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी झाड़ियों में लुप्त हो गई।
कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे पारधी ! मैं थोड़ी देर पहले ही ऋतु से निवृत्त हुई हूँ। कामातुर विरहिणी हूँ। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूँ। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊँगी।'

शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर न लगाई, वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, 'हे पारधी! मैं इन बच्चों को पिता के हवाले करके लौट आऊँगी। इस समय मुझे मत मार।'
शिकारी हँसा और बोला, 'सामने आए शिकार को छोड़ दूँ, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूँ। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे।'

उत्तर में मृगी ने फिर कहा, 'जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी, इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान माँग रही हूँ। हे पारधी! मेरा विश्वास कर मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ।'
मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के आभाव में बेलवृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्व करेगा।

शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला,' हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि उनके वियोग में मुझे एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूँ। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण जीवनदान देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊँगा।'
मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटना-चक्र घूम गया। उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियाँ जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएँगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ।'

उपवास, रात्रि जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गए। भगवान शिव की अनुकम्पा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।
थोड़ी ही देर बाद मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आँसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया।

देव लोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहा था। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए।'


Post Date : 03/11/2021
Title : *वेदों में नारी की महिमा*
Description :

 *वेदों में नारी की महिमा*





(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष)

संसार की किसी भी धर्म पुस्तक में नारी की महिमा का इतना सुंदर गुण गान नहीं मिलता जितना वेदों में मिलता हैं.कुछ उद्हारण देकर हम अपने कथन को सिद्ध करेगे.

*१. उषा के समान प्रकाशवती-*

ऋग्वेद ४/१४/३

हे राष्ट्र की पूजा योग्य नारी! तुम परिवार और राष्ट्र में सत्यम, शिवम्, सुंदरम की अरुण कान्तियों को छिटकती हुई आओ , अपने विस्मयकारी सद्गुणगणों के द्वारा अविद्या ग्रस्त जनों को प्रबोध प्रदान करो. जन-जन को सुख देने के लिए अपने जगमग करते हुए रथ पर बैठ कर आओ.

*२. वीरांगना-*

यजुर्वेद ५/१०

हे नारी! तू स्वयं को पहचान. तू शेरनी हैं, तू शत्रु रूप मृगों का मर्दन करनेवाली हैं, देवजनों के हितार्थ अपने अन्दर सामर्थ्य उत्पन्न कर. हे नारी ! तू अविद्या आदि दोषों पर शेरनी की तरह टूटने वाली हैं, तू दिव्य गुणों के प्रचारार्थ स्वयं को शुद्ध कर! हे नारी ! तू दुष्कर्म एवं दुर्व्यसनों को शेरनी के समान विश्वंस्त करनेवाली हैं, धार्मिक जनों के हितार्थ स्वयं को दिव्य गुणों से अलंकृत कर.

*३. वीर प्रसवा*

ऋग्वेद १०/४७/३

राष्ट्र को नारी कैसी संतान दे

हमारे राष्ट्र को ऐसी अद्भुत एवं वर्षक संतान प्राप्त हो, जो उत्कृष्ट कोटि के हथियारों को चलाने में कुशल हो, उत्तम प्रकार से अपनी तथा दूसरों की रक्षा करने में प्रवीण हो, सम्यक नेतृत्व करने वाली हो, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष रूप चार पुरुषार्थ- समुद्रों का अवगाहन करनेवाली हो, विविध संपदाओं की धारक हो, अतिशय क्रियाशील हो, प्रशंशनीय हो, बहुतों से वरणीय हो, आपदाओं की निवारक हो.

*४. विद्या अलंकृता*

यजुर्वेद २०/८४

विदुषी नारी अपने विद्या-बलों से हमारे जीवनों को पवित्र करती रहे. वह कर्मनिष्ठ बनकर अपने कर्मों से हमारे व्यवहारों को पवित्र करती रहे. अपने श्रेष्ठ ज्ञान एवं कर्मों के द्वारा संतानों एवं शिष्यों में सद्गुणों और सत्कर्मों को बसाने वाली वह देवी गृह आश्रम -यज्ञ एवं ज्ञान- यज्ञ को सुचारू रूप से संचालित करती रहे.

*५. स्नेहमयी माँ*

अथर्वेद ७/६८/२

हे प्रेमरसमयी माँ! तुम हमारे लिए मंगल कारिणी बनो, तुम हमारे लिए शांति बरसाने वाली बनो, तुम हमारे लिए उत्कृष्ट सुख देने वाली बनो. हम तुम्हारी कृपा- दृष्टि से कभी वंचित न हो.

*६. अन्नपूर्ण*

अथर्ववेद ३/२८/४

इस गृह आश्रम में पुष्टि प्राप्त हो, इस गृह आश्रम में रस प्राप्त हो. इस गिरः आश्रम में हे देवी! तू दूध-घी आदि सहस्त्रों पोषक पदार्थों का दान कर. हे यम- नियमों का पालन करने वाली गृहणी! जिन गाय आदि पशु से पोषक पदार्थ प्राप्त होते हैं उनका तू पोषण कर.

*यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।*
*यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:।।*

जिस कुल में नारियो कि पूजा, अर्थात सत्कार होता हैं, उस कुल में दिव्यगुण , दिव्य भोग और उत्तम संतान होते हैं और जिस कुल में स्त्रियो कि पूजा नहीं होती, वहां जानो उनकी सब क्रिया निष्फल हैं.
Post Date : 03/10/2021

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mayank rana

Sharing Light Of Truth , Smile And Tears Of History , lets being a Spritual journey together. https://www.touchofhistory.tk/..


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